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अगरहो प्यार के मौसम तो हमभी प्यार लिखेगें,खनकतीरेशमी पाजेबकी झंकारलिखेंगे

मगर जब खून से खेले मजहबीताकतें तब हम,पिलाकर लेखनीको खून हम अंगारलिखेगें

Wednesday, November 17, 2010

क्या लिखूं?



क्या लिखूं?
कलम चलती नहीं उसके बारे में लिखने को
क्या कहूँ उसे?
चाँद का टुकड़ा !
गुलाब की पंखुड़ी!
शीत की चांदनी!
मई की गर्मी!
वह तो ऐसी ही थी
कोई भी उपमा उसके लिए तुक्ष जान पड़ती है
सोचता हूँ उसके बारे में
दिल करता है उसके बारे में कुछ लिखने को
कलम से बांध दूं उसे
लेकिन कैसे संभव है यह?
सागर पर टहलना
हवा को पकड़ना
बहुत कठिन
कठिन ही नहीं असंभव भी
किन्तु दिल नहीं मानता
मज़बूरी को नहीं पहचानता
कुछ कहना चाहता है
तो चाँद कहूँ?
नहीं नहीं
यह बेइज्जती होगी
सावन के घटा की तरह उसके बालों की
सूरज की तरह चमकते ललाट की
गुलाब की तरह उसके होठों की
यह बेइज्जती होगी
उसकी सांगीतिक आवाज़ की
झील की तरह उसकी आँखों की
मोरनी की तरह उसकी चाल की
तो क्या कहूँ?
उसके समान वाही है
यही बात सही है
तो छोडो
क्या लिखूं?


-राहुल पंडित

4 comments:

  1. Bahut badhiya "Kavita" likhi hai. ISSE ye bhi pata chalta hai ki aap ek bahut achhe "KAVI" ho.

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  2. मेरी भी समझ में नही आ रहा की इतनी अच्छी कविता के बारे में क्या लिखू .
    लाजवाब , लाजवाब, लाजवाब

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  3. sundar kavita.....dhanyavaaad

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  4. सुन्दर अभिव्यक्ति से परिपूर्ण कविता.....वैसे क्या लिखूं में लिख तो सारा दिया है आपने.........
    साधुवाद

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