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अगरहो प्यार के मौसम तो हमभी प्यार लिखेगें,खनकतीरेशमी पाजेबकी झंकारलिखेंगे

मगर जब खून से खेले मजहबीताकतें तब हम,पिलाकर लेखनीको खून हम अंगारलिखेगें

Tuesday, October 26, 2010

तौबा तेरे सोलह साल




अल्हड़ नदी की धवल धार सी
अविरल जब तू मुस्काती है
बात-बात में गुस्सा करती
चलती-चलती इठलाती है
देख रूप सौंदर्य तुम्हारा
जग सारा हो गया निहाल
तौबा तेरे सोलह साल
मोती जैसे दांत तुम्हारे
कोयल जैसी बोली
रंग विरंगे वासन तुम्हारे
जैसे हो रंगोली
मृगनयनी तेरी चितवन से
कामदेव भी हुए बेहाल
तौबा तेरे सोलह साल
लट ऊँगली में जब उलझाती
लगे मेघ क्रीड़ा विमग्न हो
केशो में ही उलझ गए हों
पवन वेग से व्याकुल होकर
आतुर हैं स्वछन्द विचरण को
रोक रहे माया से बाल
तौबा तेरे सोलह साल
तेरी हर एक अदा निराली
मृग्सवाक सी आँखे काली
हिमकण जैसा रंग तुम्हारा
भानुसुता सी पहने बाली
जब पायल खनकाती पैरों में
ढोल-गीटार भी लगे बेताल
तौबा तेरे सोलह साल
हंससुता सी गर्दन तेरी
रति के जैसा चितवन
खुश होती तो ऐसे लगता
खुश हैं जग के कड़-कड़
उपमा किससे करूँ तुम्हारी
तुम ही तुम हो,सरे ब्याल
तौबा तेरे सोलह साल
हे विश्वसुन्दरी राहुल को
सपने में दरस दिखा जाना
पूरे जीवन के योग्य नहीं
पल दो पल साथ बीता जाना
कह देना मित्र हिमांशु से
योगी का क्या हो गया हाल
तौबा तेरे सोलह साल


-राहुल पंडित

(ये काब्य विशेष रूप से मेरे एक मित्र हिमांशु मोंगा(एफर्ट बीपीओ लिमिटेड) के मांग पर...उनको समर्पित.)

3 comments:

  1. सुन्दर भाव , बधाई !

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  2. आज लगा की आप युवा है .
    बहुत सुन्दर रचना

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