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अगरहो प्यार के मौसम तो हमभी प्यार लिखेगें,खनकतीरेशमी पाजेबकी झंकारलिखेंगे

मगर जब खून से खेले मजहबीताकतें तब हम,पिलाकर लेखनीको खून हम अंगारलिखेगें

Saturday, June 5, 2010

आये गर्मी के प्यारे दिन


आये गर्मी के प्यारे दिन
सब लोगों का तन-मन डोला
आग सरीखा तपता सूरज
लगता जैसे आग का गोला
मोती के दानो से जल कड़
पूरे शारीर पर छ जाये
आये पंखे-कूलर के दिन
हवा सभी के मन को भाए
शाम समय गंगा के तट पर
फिर से आये सभी नहाने
पुरे दिन झेली गर्मी से
एक बार छुटकारा पाने
रात हुई,कुछ छत पर बैठे
कुछ पेड़ों के नीचे सोते
गर्मी से व्याकुल हो बच्चे
रात-रात भर जगते रोते
इतने दुःख के बावजूद भी
गर्मी मुझको भाती है
आखिर ऐसा हो भी क्यूँ न
छुट्टी जो ये लाती है.
-राहुल पंडित

2 comments:

  1. yar garmi or suhare din

    kuch kuch gadbad he



    bahut khub



    फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई

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