ॐ धर्मो: रक्षति रक्षितः,जय हिंद जय हिंदुत्व --जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी-- वो हिन्दू हो या मुसलमान,जिसको इस देश से प्यार नहीं है.उसको इस देश में,रहने का अधिकार नहीं है.-- अगर भारत भूमि में रहना होगा.वन्देमातरम कहना होगा.-- राष्ट्र धर्म सर्वोपरि है.

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अगरहो प्यार के मौसम तो हमभी प्यार लिखेगें,खनकतीरेशमी पाजेबकी झंकारलिखेंगे

मगर जब खून से खेले मजहबीताकतें तब हम,पिलाकर लेखनीको खून हम अंगारलिखेगें

Monday, February 22, 2010

रग-रग हिन्दू मेरा परिचय


मै शंकर का वह क्रोधानल,कर सकता जगती क्षार-क्षार.
मै डमरू की वह प्रिय ध्वनि हूँ,जिसमे नाचता भिसन संहार.
रणचंडी की अतृप्त प्यास,मै दुर्गा का उन्मत्त हास.
मै यम की प्रलयंकर पुकार,जलते मरघट का धुआधार.
फिर अंतरतम की ज्वाला से,जगती में आग लगा दूं मै.
गर धधक उठे जल,थल-अम्बर,तो फिर इसमें कैसा विस्मय.
हिन्दू तन मन,हिन्दू जीवन,रग-रग हिन्दू मेरा परिचय.
मै आदि पुरुष निर्भयता का,वरदान लिए आया भू पर.
पय पीकर सब मरते आये,लो अमर हुआ मै विष पीकर.
अधरों की प्यास बुझाई है,मैंने पीकर वो आग प्रखर.
हो जाती दुनिया भास्म्सार,जिसको पल भर में ही छूकर.
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन.
मै नर,नारायण-नीलकंठ,बन गया न इसमें कुछ संसय.
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
मै अखिल विश्व का गुरु महान,देता विद्या का अमर दान.
मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग,मैंने सिखलाया ब्रह्मज्ञान.
मेरे वेदों की ज्योति प्रखर,मेरे वेदों का ज्ञान अमर.
मानव के मन अंधकार,या हो सामने सत्य सहर.
मेरे स्वर नभ में घहर-घहर,सागर के जल में फहर-फहर.
इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मय
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
मय तेज पुंज तम्लीन जगत में,फैलाया मैंने प्रकाश.
जगती का रच कर के विनाश,कब चाह है खुद का विकाश?
सरणागत की रक्षा की है,मैने अपना जीवन देकर.
विश्वाश अगर नहीं आता तो,साक्षी है इतिहास अमर.
यदि आज बनारस के खंडहर,सदिओं की निद्रा से जगकर.
हुंकार उठे हिन्दू की जय,तो फिर इसमें कैसा विस्मय?
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
दुनिया के वीराने पथ पर,जब-जब नर ने खायी ठोकर.
दो आंशु शेष बचा पाया,जब मानव ने सबकुछ खोकर.
मै आया तभी द्रवित होकर,मै आया ज्ञान दीप लेकर.
भूला भटका मानव पथ पर,चल निकला सोते से जगकर.
पथ के आवर्तों से थक-कर,जब बैठ गया मानव पथ पर.
उस नर को राह दिखाना ही,मेरा सदैव का दृढ़ निश्चय.
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
मैंने छाती का लहू पिला,पाले विदेश के सृजित लाल.
मुझको मानव में भेद नहीं,मेरा अन्तःस्थल वर विशाल.
जग से ठुकराए लोगों को,लो मेरे घर का खुला द्वार.
अपना हूँ सबकुछ लुटा चूका,फिर भी अक्षय है धनागार.
मेरा हीरा पाकर ज्योतित,परीकिओं का वह राजमुकुट.
इन चरणों पर अगर झुक जाये,कल वह कीरीट तो क्या विस्मय?
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
मै वीर पुत्र मेरे जननी के जगती में जौहर अपार.
अकबर के पुत्रों से पूछो,क्या याद उन्हें मीना बाज़ार?
क्या याद उन्हें चितौड दुर्ग में जलने वाली आग प्रखर?
जब हाय सहस्त्रों माताएं,तिल-टिक जलकर हो गयी अमर.
वो बुझने वाली आग नहीं,रग-रग में उसे समाये हूँ.
यदि कभी अचानक फूट पड़े,विप्लव लेकर तो क्या संशय?
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
होकर स्वतंत्र मैंने कब चाह,कर लूं सरे जग को गुलाम?
मैंने तो सदा सिखाया है,करना अपने मन को गुलाम.
गोपाल-राम के नमो पर मैंने कब अत्याचार किया?
कब दुनिया को हिन्दू करने,घर-घर में नरसंहार किया?
कोई बतलाये काबुल में जाकर कितनी मस्जिद तोड़ी?
भूभाग नहीं,शत-शत मानव का ह्रदय जितने का निश्चय.
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.
मै एक विन्दु,परिपूर्ण सिन्धु है,यह मेरा हिन्दू समाज.
मेरा इसका सम्बन्ध अमर,मै ब्यक्ति और यह है समाज.
इससे मैंने पाया तन-मन,इससे मैंने पाया जीवन.
मेरा तो बस कर्त्तव्य यही,कर दूं इसको सबकुछ अर्पण.
मै तो समाज की थाती हूँ,मै तो समाज का हूँ सेवक.
मै हिन्दू हित के लिए सदा,कर दूं खुद का बलिदान अभय.
हिन्दू तन-मन,हिन्दू जीवन,रग रग मेरा हिन्दू परिचय.

3 comments:

  1. सादर वन्दे
    अटल जी की यह कविता इस भारत की परिभाषा है, इसे प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद!
    रत्नेश त्रिपाठी
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  2. अति उतम प्रयास
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